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एक ग़ज़ल : एक समन्दर मेरे अन्दर---

एक ग़ज़ल : एक समन्दर ,मेरे अन्दर...एक  समन्दर ,  मेरे  अन्दर शोर-ए-तलातुम बाहर भीतरएक तेरा ग़म  पहले   से हीऔर ज़माने का ग़म उस परतेरे होने का ये तसव्वुरते...
clicks 17  Vote 0 Vote  1:42pm 2 Nov 2018

ग़ज़ल : हमें मालूम है संसद में फिर ---

ग़ज़ल  : हमें मालूम है संसद में फिर ---हमें मालूम है संसद में कल फिर क्या हुआ होगाकि हर मुद्दा सियासी ’वोट’ पर  तौला  गया होगावो,जिनके थे मकाँ वातानुकूलित ...
clicks 3  Vote 0 Vote  7:40pm 27 Oct 2018

आंसुओं को पनाह नहीं मिलती!

तोहमतें हजार मिलती हैं,नफरतें हर बार मिलती हैं,टूट कर बिखरने लगता है दिल,आंखें जार-जार रोती हैं,देख कर भी अनदेखा कर देते हैं लोग,आंसुओं को पनाह नहीं मिलती...
clicks 42  Vote 0 Vote  11:19am 26 Oct 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 55

चन्द माहिया : क़िस्त 55:1:शिकवा न शिकायत हैजुल्म-ओ-सितम तेराक्या ये भी रवायत है:2:कैसा ये सितम तेरासीख रही हो क्या ?निकला ही न दम मेरा :3:छोड़ो भी गिला शिकवाअहल-ए-...
clicks 18  Vote 0 Vote  4:54pm 20 Oct 2018

महिमा अपरंपार है इनकी

मेरी इस रचना का उद्देश्य किसी वर्ग विशेष परआक्षेप करना नहीं है बल्कि मैं उस सत्य कोशब्द रूप में प्रकट कर रहीं हूँ जो प्रतिदिन हमारे सामने आता है।बड़ा अच...
clicks 7  Vote 0 Vote  9:03am 17 Oct 2018

दर्द का समंदर

जब टूटता है दिलधोखे फरेब सेअविश्वास और संदेह सेनफरतों के खेल सेतो लहराता है दर्द का समंदररह जाते हैं हतप्रभअवाक् इंसानों के रूप सेसीधी सरल निष्कपट जिन...
clicks 28  Vote 0 Vote  10:15pm 14 Oct 2018

एक व्यंग्य : सबूत चाहिए ---

एक लघु व्यथा : सबूत चाहिए.....[व्यंग्य]विजया दशमी पर्व शुरु हो गया । भारत में, गाँव से लेकर शहर तक ,नगर से लेकर महानगर तक पंडाल सजाए जा रहे हैं ,रामलीला खेली ज...
clicks 12  Vote 0 Vote  5:03pm 14 Oct 2018

एक ग़ज़ल : वातानुकूलित आप ने---

वातानुकूलित आप ने आश्रम बना लिएसत्ता के इर्द-गिर्द ही धूनी रमा  लिए’दिल्ली’ में बस गए हैं ’तपोवन’ को छोड़कर’साधू’ भी आजकल के मुखौटे चढ़ा लिएसब वेद ज्ञान ...
clicks 8  Vote 0 Vote  3:02pm 13 Oct 2018

विषमता जीवन की

ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं के समक्षबनी ये झुग्गियांविषमता का देती परिचयमारती हैं तमाचा समाज के मुख परचलता है यहां गरीबी का नंगा नाचभूखे पेट नंगे तनभटकता भा...
clicks 32  Vote 0 Vote  10:35am 12 Oct 2018

एक ग़ज़ल : जड़ों तक साज़िशें---

एक ग़ज़ल : जड़ों तक साजिशें गहरी---जड़ों तक साज़िशें गहरी ,सतह पे हादसे थेजहाँ बारूद की ढेरी , वहीं  पर  घर  बने थेहवा में मुठ्ठियाँ ताने  जो सीना  ठोकते थे...
clicks 8  Vote 0 Vote  11:39am 6 Oct 2018
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